महावीराष्टक - स्तोत्रम्

दर्शन स्तुति

देव स्तुति

गुरुदेव स्तुति

 
 
 
 
 

देव स्तुति

 

जय वीतराग विज्ञानपूर, जय मोह-तिमिर को हरन सूर ।
जय ज्ञान अनन्तानन्त धार, दृग-सुख-बीरज-मंडित अपार ।।

जय परम शान्ति मुद्रा समेत, भवि-जनको निज अनुभूति देत ।
भवि-भागनवश जोगे वशाय, तुम ध्वनि है सुनिविभ्रम नशाय ॥

तुम गुण चिन्तत निज-पर-विवेक, पकटे विघटेआपद अनेक ।
तुम जगभूषण दूषण -विमुक्त, सब महिमायुक्त विकल्प-मुक्त ॥

अविरूध्द शुध्द तेतन स्वरूप, परमात्म परम पावन अनूप ।
शुभ अशुभ विभाव अभाव की, स्वाभाविक परणतिमय अछीन ॥

अष्टादश दोष विमुक्त धीर, स्वचतुष्टय मय राजत गंभीर ।
मुनि गणधरादि सेवत महन्त, तब केवल-लब्धि-रमा धरन्त ॥

तुम शासन सेय अमेय जीव, शिव गये जाहिं जंहैं सदीव ।
भवसागर में  दुख क्षार वारि, तारण की और न आप टारि ॥

यह लखि निल दुख -गदहरण काज, तुमही निमित्त कारण इलाज
जाने तातै मैं शरण आय, उचरों निज दुख जो चिर लहाय॥

मैं भ्रम्यो अपनपो विसरि आप, अपनाये विधि फल पुण्यपाप ।
निजको परको करता पिछान, परमें अनिष्टताइष्ट ठान ॥

आकुलित भयो अज्ञान धारि, ज्यों मृग मृग-तृष्णा जानिवारि ।
तन-परणति में आपो चितार, कबहू न अनुभवो स्व-पदसार ॥

तुम को जानेबिन जो कलेश, पाये सो तुम जनत जिनेश ।
पशु नारक-नर-सुर-गति-मझार, भव धर धर मरयो अनन्तवार ॥

अब काल-लब्धि बलतै दयालु, तुम दर्शन पाय भयो खुशाल ।
मन शांत भयो मिटि सकलद्वन्द्व, चाख्यो स्वातमरस दुख निकंद ॥

तातै अब ऐसी करहुं नाथ, विछुडे न कभी तुम चरण साथ ।
तुम गुणगधको ना छेव देव, जगतारण को तुम विरद एव ॥

आतम के अहित विषय कषाय, इनमें मेरी परिणति न जाय ।
मैं रहूं आपमें आप लीन, सो करो हाडं जो निजाधीन ॥

मेरे न चाह कछु और ईश, रत्नत्रय निधि दीजे मुनीश ।
मुझ कारज के कारणसु आप, शिव करहु हरहु मम मोह ताप ॥

शशिशांतिकरण तपहरण हेत, स्वयमेव तथा तुम कुशल देत ।
पीवत पियूष ज्यों रोग जाय, त्यों तुम अनुभव ते भव नशाय ॥

त्रिभुवन तिहंकाल मझारकोय, नहिं तुम बिन निजसुख्दाय होय ।
मो उरयह निश्चय भयो आज, दुखजलधिउबारन तुम जहाज ॥

दोहा - तुम बुणगण-मणि गधपती, गधत न पावहि पर ।
'दौल' स्वल्पमति किम कहै, नमू त्रियोग सम्हार ॥